God never gets you in a trouble , you can'thandle.Rather He wants You to know your Strength & Potential.Have faith inHIM & yourself...and you are through.A Winner...always.

Thursday, October 11, 2007

GKD 1

लाइबरेरी के पोरिट्को मे कार रुकी थी और उसके अंदर ही डाक्टर साहब की लड़की बैठी थी !

"क्यों सुधा अंदर क्यों बैठी हो?"

"तुम्हें ही देख रही थी चंदर ! ",और वह उतर आयी ! दुबली पतली ,नाटी सी ,साधारण सी लड़की ,बहुत सुंदर नही ,केवल सुंदर !
बातचीत मे बहुत दुलारी !

"चलो, चलो ! ",चंदर ने कहा !
वह आगे बढ़ी ,phir ठिठक गयी ,और बोली ,"चंदर एक को चार kitaaben milatii
हैं ?"
"हाँ !क्यों ?"
"तो ...तो ..." उसने बडे़ भोलेपन से मुस्कुराते हुए कहा -"तुम अपने नाम से मेंबर
बन जाओ ,और दो किताबें हमे दे दिया करना बस,ज्यादा का हम क्या करेंगे ?"
"नहीं " चंदर हंसा -"तुमारा तो दिमाग खराब है ! खुद क्यों नही बनती मेंबर ?"
"नहीं ,हमे शरम लगती है ,तुम बन जाओ मेंबर हमारी जगह पर !"
"पगली कहीँ की !" चंदर ne उसका कंधा पकड़कर
चलते हुए कहा -"वाह रे शरम ! अभी
कल ब्याह होगा तो कहना ,हमारी जगह तुम बैठ जाओ चंदर !कालेज मे पहुंच गयी लड़की ,अभी शरम नही छूटी इसकी !चल अन्दर !"

और वह हिचकती ठिठकती ,झेंपती और मुड़-मुड़कर चंदर की ओर रूठी हुई निगाहों से देखती हुई अंदर चली गयी !"

थोड़ी देर बाद सुधा चार किताबें लादे हुए निकली !
कपूर ने कहा-"लाओ ,मैं ले लूँ !"तो बांस की पतली टहनी कि तरह लहराकर बोली -"सदस्य मैं हूँ !तुम्हें क्यों दूँ किताबें ?" और जाकर कार के अंदर किताबें पटक दीं ! फिर बोली ,"आओ बैठो चंदर !


"मैं अब घर जाऊंगा !"

"उंहू ,यह देखो !"और उसने भीतर से कागजों का एक बंडल निकाला और बोली -"देखो! यह पापा ने तुमारे लिए दिया है !lucknow मे कोन्फेरेंस है ना !वहीँ पढने के लिए यह निबंध लिखा है उन्होने !शाम तक यह टाईप हो जाना चाहिऐ !जहाँ संख्याएँ हैं वहाँ आपको खुद बैठकर बोलना होगा! समझे जनाब?"उसने बिल्कुल अल्हड बच्चों कि तरह गरदन हिलाकर शोख स्वर मे कहा !

कपूर ने बंडल ले लिया और कुछ सोचता हुआ बोला -"लेकिन डाक्टर साहब का हस्तलेख ,इतने प्रष्ठ ,शाम तक कौन टाईप कर देगा ?"

"इसका भी इंतजाम है "-और अपने ब्लाउज़ म से पत्र निकालकर चंदर के हाथ मे देती हुई बोली -"यह पापा कि कोई पुराणी इसायी छात्र है ! typist !इसके घर मैं तुम्हें पहुचाये देती हूँ !मुख़र्जी रोड़ पेर रहती है यह !उसीके यहाँ टाईप करवा लेना और उसे यह ख़त दे देना !"

"लेकिन मैंने अभी चाय नही पी !"

"समझ गए ,अब तुम सोच रहे होगे इसी सुधा तुम्हें चाय भी पिला देगी !सो मेरा काम नही है कि मैं चाय पिलाऊं ?पापा का काम है यह!
चलो आओ !"


चंदर भीतर जाकर बैठ गया और किताबें उठाकर देखने लगा -"अरे चारों कविता कि किताबें उठा लाई ?-समझ मे आएँगी तुम्हें?क्यों सुधा?"

"नहीं ,"चिढ़ाते हुए सुधा बोली "तुम कहो,तुम्हें समझा दें !economics पढने वाले क्या जाने साहित्य ?"

"अरे !मुख़र्जी रोड़ चलो !"सुधा बोली -"चाय पी लो तब जाना !"
"नहीं,मैं चाय नही पियूँगा !"चंदर बोला

"चाय नही पियु गा ,वाह!वाह !"सुधा कि हंसी मे दूधिया बचपन छलक उठा !-"मुँह तो सूख कर गोभी हो रहा है ,चाय नही पियेंगे !"

बंगला आया तो सुधा ने महाराजिन से चाय बनाने के लिए कहा और चंदर को study रूम मे बिठाकर प्याले निकालने के लिए चल दी !


This is a page from a novel "Gunahon ka Devta" by Dharmveer bharti.My first novel ever ,in hindi and one of my fevorits.I don't really want you to loose its charm by knowing its story itself,but for the reference purpose only, I tell you ,this is a story about a very ordinary girl of sixteen and twenty-two year old guy ,use to come to her place often to meet her father.Who helps him in completing his degree.They both are quite familier to each other,upto which extent...they themselves don't know.There are two more girls,one is the cousine of this girl and other one is a mature christian anglo-indian.

This story compels me to think alot of things,including "is it necessary for each relationship that exists in this world ,should posses a well defined name?There may be some bonds that are beyond definitions.Sometimes no one is wrong,its only circumstances and time that make them doing wrong things,choosing wrong options.

Though as you are done with d book,you may think there cud b a better title for this stroy,yet d way writer has narrated it,is excellent.You will fall in love with each of d characters.And d most amazing thing is,you just cant blame any character for anything.They all seem to b right at their stand.

And d girl "sudha" is just darling.So much innocent,cute and lovely she is ,as story starts..but how circumstances change her is worth reading.Three girls of three type,one loving and responsible father,one gentle friend,lover,one simple husband,one crazy brother...so many different characters and their lives,stands,thoughts,perceptions, and their dilemma.Wonderful novel with tragic end.

2 comments:

पंकज said...
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पंकज said...

मैनें हिन्दी उपन्यास पढ़ना इसी उपन्यास के साथ प्रारम्भ किया था. मेरी उम्र कोइ १३-१४ साल रही होगी.. उस वक़्त कहीं से मिल गया बस यूं ही पढ़ लिया और भूल गया.. जिन्दगी थोड़ी आगे सरकी और १० साल बाद कहीं से यही उपन्यास फ़िर पढ़ने को मिल गया.. फ़िर समझ में आया कि १० साल का अन्तर क्या होता है... सच कहूँ तो ये एक आम कहानी है.. चन्दर कोई भी हो सकता है, मैं तुम य फ़िर समाज का कोई भी आम प्राणी, जो अच्छाई के सपने देखता है, जो आदर्शवादिता के दायरों को फ़िर से परिभाषित करने का विचार रख सकता हो..

पर दुनिया के निर्माण और दुनिया के कर्तव्यों में व्यवहारिकता और आदर्श के बीच समय समय पर होने वाले टकराव इन्सान को वो सब करने को मजबूर कर देते हैं जो कभी कभी हमारे खुद के सपनों के लिये, हमारे प्रियजनों की उम्मीदों के लिये आत्मघाती होते हैं .
और इन्सानी जिजीविशा की यही कहानी उसे वो गुनाह करने पर विवश कर देती है, जो उसे देवता तो सिद्ध कर देती है... पर एक बहुत महँगी कीमत पर.....

शायद भारती जी ने इस उपन्यास को ऐसा अजीब सा नाम देने से पहले बहुत बार सोचा होगा.. और कौन जानता था कि ये एक दिन कालजयी हस्ताक्षर बन जायेगा..

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